☆ पावर सप्प्लाई क्या होता है?
प्रजेंट टाइम में सॉलिड स्टेट उपकरण अर्थात ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इलेक्ट्रिकल जिनमें ट्रांजिस्टर या इंटीग्रेटेड सर्किट का प्रयोग किया जाता है अधिक मात्रा में बनाए जा रहे हैं इन उपकरणों के लिए ऐसी पावर सप्लाई की आवश्यकता होती है जिसमें सामान लोड पर करंट और वोल्ट का मान स्थिर रहे स्थिर सप्लाई केवल सेल या बैटरी से ही प्राप्त किया जा सकता है अन्य सभी माध्यमों से प्राप्त होने वाली विद्युत सप्लाई को प्रयोग करने से पहले आवश्यकतानुसार स्थिर करना पडता है। किसी भी इलेक्ट्रिक होम अप्लायंस की पावर सप्लाई उसके आवश्यकता पर निर्भर करती है AC मेंस से अधिकतर 180 वोल्ट से 300 वोल्ट AC विद्युत प्राप्त होती है पावर सप्लाई विभाग इस विद्युत को वंचित DC सप्लाई में बदलता है।
☆Types of power supply part.-:
पावर सप्प्लाई विभाग के प्रकार-:
इलेक्ट्रिक होम अप्लायंस में प्रयोगिक पावर सप्लाई विभाग तीन प्रकार से बनाए जाते हैं-:
1-: अनरेगुलेटेड पावर सप्लाई ।
2-: नॉर्मल रेगुलेटेड पावर सप्लाई ।
3-: फुल रेगुलेटेड पावर सप्लाई ।
1-: Unregulated power supply-:
इस पावर सप्लाई में आउटपुट सप्लाई का मान संभवतः इनपुट सप्लाई के मान पर निर्भर करता है जैसे-जैसे इनपुट सप्लाई कम या अधिक होती है वैसे वैसे आउटपुट सप्लाई का मान भी कम या अधिक होता है।
साधारण एलिमिनेटर(Normal eliminetor) (adopter)से प्राप्त होने वाली अन रेगुलेटेड पावर सप्लाई होती है।
2-: Normal regulated power supply-:
इस प्रकार की पावर सप्लाई को अन रेगुलेटेड पावर सप्लाई विभाग के आउटपुट विभाग के पैरेलल मे एक रीवर्श बायश्ड जेनर डायोड लगाकर आउटपुट वोल्टेज को रेगुलेट किया जाता है।
3-: full regulated power supply -:
इस प्रकार के पावर सप्लाई को रेगुलेट करने के लिए रेगुलेशन प्रक्रिया के लिए या तो ट्रांजिस्टर होते ही हैं इनमें IC का प्रयोग किया जाता है अच्छे किस्म की रेगुलेटेड पावर सप्लाई में आउटपुट वोल्ट और करंट का मान इनपुट एसी के एक निश्चित सीमा लगभग 180 से 250 वोल्ट तक स्थिर रहता है।
Block daigram of a unregulated power supply-:
अनरेगुलेटेड पावर सप्प्लाई का चित्रित डाइग्राम-:
(1)-: AC इनपुट 180-240 v
⇓
(2)-: स्टेप अप/स्टेप डाउन स्टेज(ट्रान्सफार्मा)
⇓
(3)-: AC
⇓
(4)-: रेक्टिफायर स्टेज(ब्रिज रेक्टिफायर)
⇓
(5)-: (+)DC (-)
⇓
(6)-: फिट्रेशन स्टेज (केपेसिटर)
⇓
(8)-: DC आउटपुट
☆ How many is parts to make a unregulated power supply -:
☆ पावर सप्प्लाई मे मुख्य कितने भाग होते है-:
एक अनरेगुलेटेड पावर सप्लाई जिसे हम सामान्य भाषा में एलिमिनेटर या एडोप्टर के नाम से पहचानते हैं उन मे मुख्यतः तीन भाग बने होते हैं।
1-:Step up or step down part
स्टेप अप या स्टेप डाउन विभाग
2-:Rectification part
रेक्टिफिकेशन विभाग
3-:Filtration part
फिल्ट्रेशन विभाग
1-: Step up or step down parts.
सामान्यतः घरों में दी जाने वाली एसी सप्लाई 230 या 220 वोल्ट की होती है जबकि विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अलग-अलग मान के AC या DC सप्लाई पर चलते हैं किसी भी प्रकार की पावर सप्लाई का स्टेप डाउन या स्टेप अप विभाग 230 वोल्ट या 220 वोल्ट AC को उस से चलाए जाने वाले उपकरण की आवश्यकता के अनुसार एसी सप्लाई को कम या अधिक करता है सामान्यतः यह कार्य ट्रांसफार्मर के प्रयोग से किया जाता है ट्रांसफार्मर के इनपुट सिरे पर 230 या 220 वोल्ट की सप्लाई दी जाती है । जो ट्रान्सफारमर आउटपुट मे इनपुट से अधिक सप्लाई प्रदान करते हैं उसे स्टेप अप ट्रांसफॉर्मर कहते हैं ऑडियो आउटपुट मे इनपुट से कम सप्प्लाई प्रदान करता है उसे स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर कहते हैं।
सामान्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में अधिकतर स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर ही प्रयोग किए जाते हैं स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर निम्न प्रकार के होते हैं।
Singal wanding Transfarmar-:
सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में प्राइमरी में दो और सेकेंडरी में दो सिरे निकले हुए होते हैं। प्राईमरी और सेकेंडरी अलग अलग पहचान करने के लिए प्राइमरी में लाल रंग की तारें तथा सेकेंडरी में काले रंग की या हरे रंग की तार निकली होती है कुछ ट्रांसफार्मर में तार की जगह पर वाइन्ड़िग वायर निकले होते तो उनमें दोनों वाइंडिंग के अवरोध चेक करते हैं जिस वाइंडिंग के अवरोध अधिक होता है वह प्रायमरी वाइंडिंग होता है तथा जिस वाइंडिंग का अवरोध कम हो वह सेकेंडरी वाइंडिंग होता है। इस प्रकार के ट्रांसफॉर्मर को खरीदने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमें कितने वोल्ट का ट्रांसफॉर्मर खरीदना है यदि हमें 6 वोल्ट का ट्रांसफॉर्मर खरीदना है तो दुकानदार से कहेंगे कि हमें 0-6 का ट्रांसफॉर्मर चाहिए।
0-6 का मतलब है की सेकेंडरी के एक सीरे पर 6 वोल्ट तथा दुसरे कामन सीरे पर 0 वोल्ट आयेगा।
बाजार में उपलब्ध कुछ सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफार्मर-:
0 - 3.5, 0 - 4.5 ,0 - 6 , 0 - 7.5 , 0 - 9 0 - 12 , 0 - 18 , 0 - 24 etc.
Singal wanding multi voltage transfarmar-:
सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में मल्टी वोल्टेज प्रकार के ट्रांसफार्मर भी प्रयोग किए जाते हैं इनकी सेकेंडरी में 3 या 3 से अधिक सीरे निकले होते हैं जिनमें एक सिरा कॉमन इस सिरे के सापेक्ष शेष दोनों सिरों में अलग-अलग वोल्टेज प्राप्त होते हैं ।
बाजार में उपलब्ध कुछ सिंगल वाइंडिंग मल्टी वोल्टेज ट्रांसफॉर्मर-:
0-4.5-6 , 0-6-9 , 0-9-12 etc.
1.5 से 12 वोल्ट तक के सिंगल वाइंडिंग मल्टी वोल्टेज ट्रांसफॉर्मर के सेकेंडरी में कुल 8 सीरे होते हैं जिनमें एक सिरा कॉमन होता है शेेष 7 सीरेअलग अलग वोल्टेज के होते हैं इन में से किसी एक सिरे को सिलेक्ट करने के लिए सेकेंडरी वाइंडिंग के साथ 1 पोल 7 वे स्विच का प्रयोग किया जाता है इस ट्रांसफार्मर में जब कोई वंचित वोल्ट सिलेक्ट किए जाते हैैं तो वे वोल्टेज स्विच के पोल और कामन सीरे के बीच होते है।
इस प्रकार से एक बार मे केवल एक ही प्रकार के वोल्ट प्राप्त कर सकते है।
Double wanding transfarmar-:
डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में प्राइमरी साइड में दो सिरे तथा से सेकेंडरी में 3 सीरे होते हैं तीनों सीरो में से बीच का सीरा कॉमन तथा उसके सापेक्ष दोनों सिरे समान वोल्टेज केपेसिटी के होते हैं।
3-0-3 , 4.5-0-4.5 , 6-0-6 , 9-0-9 ? 12-0-12 , 24-0-24 etc.
Double wanding multi voltage transfarmar-:
डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में भी मल्टी वोल्टेज अर्थात एक से अधिक वोल्टेज कैपेसिटी के ट्रांसफार्मर आते हैं किंतु इनमें अधिकतर दो प्रकार की वोल्टेज देने वाले ही होते हैं इसके लिए इसकी सेकेंडरी में कुल 5 तार निकले होते हैं जिनमें बीच का तार कॉमन और इन के सापेक्ष वाले दोनों सिरे समान वोल्टेज कैपेसिटी के होते हैंं तथा बाहरी किनारेेेे वाले सिरे समान वोल्टेज के होते हैं
L- wanding Trnsfarmar-:
कुछ ट्रांसफॉमर्स की सेकेंडरी वाइंडिंग में कुल 5 सिरे होते हैं जिनमें से तीन आपस में कंटिन्यूटी देते हैं तथा शेष दो आपस में कंटिन्यूटी देते हैं स्पष्ट है कि ट्रांसफार्मर में एक वाइंडिंग सिंगल कॉइल वाली है तथा दूसरी वाइंडिंग डबल कॉइल वाली है इस प्रकार के ट्रांसफार्मर में बनी सिंगल वाइंडिंग इन माइनिंग कहते हैं।
Current capacity of transfarmar :
जिस प्रकार ट्रांसफार्मर अलग-अलग वोल्टेज कैपेसिटी के आते हैं उसी प्रकार ट्रांसफार्मर में अलग-अलग करंट कैपेसिटी भी होती है।
जैसे-जैसे हम ट्रांसफार्मर की करंट कैपेसिटी बढ़ाते हैं वैसे वैसे ट्रांसफार्मर की साइज भी बड़ी होती है इसका मुख्य कारण है कि तार की मोटाई बढाई जाने पर करंट कैपेसिटी बढ़ जाती है जिसकी वजह से ट्रांसफार्मर की साइज भी बढ़ जाती है।
बाजार में उपलब्ध अलग-अलग करंट कैपेसिटी के ट्रांसफार्मर-:
200 mA, 350mA,500mA,750mA, 1 Amp,2Amp,3Amp...................10 Amp etc.
Rectification parts of power supply-:
पावर सप्लाई में लगे ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी वाइंडिंग से जो सप्लाई प्राप्त होती है वह एसी सप्लाई होती है इसे डीसी में बदलने के लिए रेक्टिफायर विभाग में दिया जाता है जो ACसप्लाई को DC में बदलता है इसे रेक्टिफिकेशन विभाग कहते हैं। रेक्टिफायर विभाग में लगे पुर्जों रेक्टिफायर या डायोड कहलाते हैं डायोड एक बेसिक पुर्जे के रूप में प्रयोग किया जाता है इसकी विशेषता यह है कि केवल यह एक ही दिशा में सप्लाई को पास करता है रेक्टिफायर सर्किट को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है।
1-:हाफ वेव रेक्टीफिकेशन
हाफ वेव रेक्टिफिएर सर्किट में सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर की सेकेंडरी से एक डायोड लगाया जब ट्रांसफार्मर की प्रायमरी वाइंडिंग को AC सप्लाई मिलती है तो उसकी सेकेंडरी से AC वोल्ट आउट होकर डायोड के नेगेटिव सिरे पर आता है यह डायोड केवल उस समय ही संचरण करता है जब उसके नेगेटिव सिरे पर AC पोजिटिव हाफ साइकिल आता है यह हाफ साइकल इसके लिए फॉरवर्ड बायस का कार्य करता है डायोड केवल फॉरवर्ड बायस मिलने पर ही सप्लाई को पास करता है ऐसी के नेगेटिव हाफ साइकिल के दौरान डायोड से कोई सप्लाई पास नहीं होती क्योंकि यह उसके लिए रिवर्स बॉयस होती है।
यदि इस सर्किट में डायोड को पलट कर लगा दिया जाए तो अब इसकी पॉजिटिव सिरे को AC सप्लाई प्राप्त होगी तथा इसका नेगेटिव हाफ साइकल फारवर्ड बायस की तरह प्राप्त होगा और डायोड की आउटपुट से नेगेटिव हाफ साइकिल प्राप्त होगा। इस प्रकार सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी कॉइल के एक सिरे पर डायोड लगाकर हाफ वेव DC प्राप्त करने की प्रक्रिया को हाफ वेव रेक्टिफिकेशन कहते हैं।
2-:फुल वेव रेक्टिफिकेशन
हाफ रेक्टिफिकेशन से प्राप्त DC अच्छी क्वालिटी की DC नहीं कहा जा सकता अच्छी क्वालिटी की DC के लिए यह जरूरी है कि दोनों हाफ पल्सो के बीच में कोई रिक्त स्थान ना हो अर्थात लगातार हाफ पल्स प्राप्त हो यह क्रिया एक विशेष प्रकार के रेक्टिफायर सर्किट के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जिसे फुल वेव रेक्टिफायर कहते हैं ।
फुल वेव रेक्टिफिकेशन दो प्रकार से किया जाता है
1-:दो डायोड के द्वारा-:
यह रेक्टिफिकेशन डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर सेकेंडरी के दोनों साइड वाले सिरो पर एक एक डायोड समान ध्रुवता में लगाकर बनाया जाता है और दोनों डायोड्स के पॉजिटिव सिरो को आपस में जोड़ा जाता है अब डायोड एक और दो तभी संचरण करेंगेे जब इन दोनों के नेगेटिव सिरे पर AC का पॉजिटिव हाफ साइकिल प्राप्त होगा जब डायोड एक पर AC का पॉजिटिव हाफ साइकल होता है तो डायोड दो पर नेगेटिव हाफ साइकल होता है और जब डायोड एक पर नेगेटिव हाफ साइकल होता है तो डायोड दो पर पॉजिटिव हाफ साइकल होता है इस प्रकार डायोड एक और दो प्रत्यावर्ती क्रम में संचरण कर के Ac के प्रत्येक हाफ साईकिल का उपयोग करते हैं परिणाम स्वरुप आउटपुट में प्राप्त डीसी के दो पल्सो के बीच रिक्तता खत्म हो जाती है।
चार डायोड के द्वारा।(ब्रिज रेक्टिफिकेशन)
एक सिंगल वाइन्डिंग ट्रान्सफार्मर की सेकेंडरी मे एक सीरे पर दो डायोड का एक का पोजिटीव व दुसरे का निगेटिव जोडा जाता है और सेकेंडरी के दुसरे सीरे पर दो डायोड का एक का पोजिटीव व दुसरे का नेगेटिव सिरा जोडा जाता है और पहले सीरे के पहले डायोड के शेष बचे नेगेटिव को दुसरे सीरे के पहले डायोड के शेष बचे निगेटिव सीरे मे जोडते हैऔर पहले सीरे के दुसरे डायोड पोजिटिव को दुसरे सीरे के पहले डायोड के पोजिटिव मे जोडते है।
Filtration system-:
रेक्टिफायर विभाग से प्राप्त होने वाली DC सप्लाई हाफ पल्सेस होने के कारण इसे किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में प्रयोगिक रूप से सही नहीं है क्योंकि बैटरी या सेल से प्राप्त होने वाली DC सप्लाई में किसी भी प्रकार का कोई पल्स नहीं होता बैटरी व शेल्स के लिए स्मूथ DC अच्छा माना जाता है।
पलसेटिंग DC को स्मूथ DC बनाने के लिए फिल्ट्रेशन विभाग का प्रयोग किया जाता है।
आप जानते है की एक केपेसिटर AC को पास करता है या उन्हे रोकता है और एक क्वाइल AC का विरोध करता है ।
अगर हम AC पल्सेटीँग लाइन के पेरेलल मे एक केपेसिटर लगाये तो यह AC पल्सेस को बाइपास कर देगा
इसके अलावा पल्सेटींग डीसी की लाइन मे अगर एक क्वाइल को सीरीज मे लगाते हैं तो यह AC पल्सेस को रोक लेगी।
इसके अलावा कुछ फिल्ट्रेशन सर्किट में रजिस्टेंस का प्रयोग किया जाता है रजिस्टेंस AC व DC पर समान कार्य करता है, इसका प्रमुख कार्य करंट को कंट्रोल करना होता है।
ये पार्ट्स पल्सेटींग DC मे से कुछ हद तक ही AC पल्सेस को अलग कर पाते हैं।
Types of filter circuits-:
फिल्टर सर्किट मुख्य रूप से तीन प्रकार केे होते है-:
1-: केपेसिटर इनपुट फिल्टर सर्किट-:
पावर सप्लाई में ऐसी पल्सेस को बाईपास करने के लिए लोड के पैरेलल में एक इलेक्ट्रोलाइट कैपेसिटर लगाया जाता है। इस कैपेसिटर को कैपेसिटर इनपुट या शंट कैपेसिटर फिल्टर कहते हैं ।
जैसे ही कैपेसिटर के सिरों पर सप्लाई आती है वैसे ही यह उसे अपने अंदर चार्ज कर लेता है कैपेसिटर की चार्जिंग तब तक चलती है जब तक कि रेक्टिफिकेशन में लगा डायोड फॉरवर्ड बायस में रहकर संचरण करता है तथा यह संचरण केवल एसी के हाफ साइकिल पर ही होता है उसके बाद जैसे ही ऐसी का दूसरा हाफ साइकिल आता है तो डायोड रिवर्स बॉयस में आ जाता है तथा कैपेसिटर की चार्जिंग रुक जाती है इस समय लोड को आवश्यक सप्लाई कैपेसिटर में चार्ज सप्लाई से मिलती है इस समय के केपेसिटर डिस्चार्ज होता है उसके बाद जैसे ही ऐसी का साइकिल बदलता है डायोड पुनः चार्ज हो जाता है यह क्रिया लगातार चलती रहती है ।
केपेसिटर कि चार्जिग और डिस्चार्जिँग की वजह से पल्सेटींग DC स्मुथ डीसी बन जाती है।
यहां कैपेसिटर के मान को निर्धारित करने के लिए विशेष सावधानी की जरूरत होती है कैपेसिटर डायोड की रिवर्स स्थिति में लोड को सप्लाई प्रदान करता है अतः इसकी चार्जिंग करंट कैपेसिटी इस स्तर की होनी चाहिए कि यह लोड को पर्याप्त करंट देकर चला सके इसके अलावा हाफ वेव रेक्टिफायर से प्राप्त आउटपुट पल्सेस की संख्या फुल वेव रेक्टिफायर में प्राप्त आउटपुट पल्सेस की संख्या से आधी होती है अतः फुल वेव रेक्टिफिकेशन अपेक्षा हाफ वेव रेक्टिफिकेशन में अधिक मान के फिल्टर की आवश्यकता होती है।
2-: चौक इनपुट फिल्टर सर्किट-:
सीरीज में लगी क्वायल भी एक फिल्टर की तरह कार्य करती है सीरीज में लगी क्वायल AC के लिए एक हाई इंपेडेंस पुर्जे की तरह कार्य करती है और AC को रोकती है लेकिन DC के लिए एक शार्ट सर्किट की तरह कार्य करती है जब किसी क्वाइल में करंट बहती है तो उसकी कोर में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इनर्जी स्टोर होती है और जब यह करंट मिलनी बंद हो जाती है तो यह स्टोर एनर्जी लोड को प्राप्त हो जाती है इस प्रकार आउटपुट में रिपल्स को कम किया जा सकता है ।
एक चौक फिल्टर में लगातार रेक्टिफायर करंट बहती है जबकि एक कैपेसिटर के प्रयोग से बने फिल्टर में केवल साइकल के बहुत कम भाग के लिये करंट बहती है। इसीलिए जहां रेक्टिफायर से लोड के लिए अधिक करंट प्राप्त की जाती है वहां चौक इनपुट फिल्टर अच्छा फिल्ट्रेशन प्रदान करता है।
3-:रजिस्टेंस कैपेसिटर फिल्टर सर्किट-:
जिसे सर्किट के लिए आउटपुट करंट का मान बहुत कम होता है वहां क्वाइल की जगह पर सामान्य रजिस्टर प्रयोग की जाती है कम करंट पर यह सर्किट अच्छा कार्य करता है तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह किफायती रहते हैं।
जैनर डायोड-:
जेनर डायोड एक ऐसा डायोड होता है जो सर्किट में वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए प्रयोग किया जाता है।
यह विभिन्न वोल्टेज और करंट कैपेसिटी के होते हैं ।
एक जेनर डायोड आने वाली अधिक सप्लाई को अपनी वोल्टेज कैपेसिटी के बराबर कर देता है लेकिन आने वाली सप्लाई है उसकी वोल्टेज कैपेसिटी से कम है तो उसे बढ़ा नहीं सकता है।
सर्किट में इसे सप्लाई के पैरेलल में लगाया जाता है।
एक सामान्य डायोड फॉरवार्ड सप्लाई को पास करता है ना कि रिवर्स को इस डायोड की भी एक निश्चित वोल्टेज और करंट कैपेसिटी होती है एक सामान्य डायोड की वोल्टेज कैपेसिटी उसकी रिवर्स सप्लाई को रोकने की कैपेसिटी होती है तथा करंट कैपेसिटी उस डायोड में से बह सकने वाली फारवर्ड करंट की अधिकतम सीमा होती है।
इसका अर्थ यह है -:
माना कि किसी जेनर की केपेसिटी 50 वोल्ट 100mA है तो इस डायोड को यदि 50 वोल्ट तक की रिवर से सप्लाई दी जाए तो यह उसे बिना खराब हुई है रोकेगा लेकिन यदि सप्लाई का मान 50 वोल्ट से अधिक हो जाएगा तो डायोड खराब हो जाएगा इसके अलावा इस डायोड की फारवर्ड करंट कैपेसिटी 100 mA इससे अधिक करंट कैपेसिटी का लोड लगा देने पर यह डायोड खराब हो जाएगा।
Combination of zener diodes-:
दो या दो से अधिक जेनर डायोड्स को एक साथ एक ही सर्किट में प्रयोग करना उनका संयोजन कहलाता है यह दो प्रकार से संयोजित किया जाता है-:
1-: Series combination of zener diodes.
दो या दो से अधिक जेनर डायोड को इस प्रकार जोड़ा जाए कि एक का कैथोड दूसरे का एनोड तथा दूसरे का कैथोड तीसरे का एनोड जुड़ा हो तो यह डायोड का सीरीज संयोजन कहलाता है इस संयोजन में कुल वोल्टेज कैपेसिटी का मान सभी जेनर डायोड की वोल्टेज कैपेसिटी के योग के बराबर होता है।
2-:Pairellal combination of zener diodes.
जब दो या दो से अधिक जेनर डायोड को इस प्रकार जोड़ा जाए कि उन सभी के कैथोड को आपस में जोड़कर कॉमन कैथोड बनाया जाए और सभी के एनोड को जोड़कर कॉमन एनोड बनाया जाए यह संयोजन जेनर डायोड का पैरेलल संयोजन कहलाता है।
इस संयोजन में लगे सभी जेनर डायोड समान वोल्टेज कैपेसिटी के होने चाहिए।
इस संयोजन में कुल वोल्टेज कैपेसिटी का मान संयोजन में लगे एक जेनर डायोड की वोल्टेज केपेसिटी के बराबर होता है लेकिन जेनर डायोड की करंट कैपेसिटी अधिक हो जाती है।
How to use a bridge rectifier in duble wanding transfarmar-:
साधारण रूप से ब्रिज रेक्टिफिकेशन के लिए सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर का प्रयोग किया जाता है लेकिन किन्ही विशेष परिस्थितियों में यदि डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में ब्रिज रेक्टिफिकेशन प्रयोग करना हो तो इस विधि का प्रयोग करें-:
चार डायोड लगाकर ब्रिज रेक्टिफिकेशन बनाया जाता है।
ब्रिज रेक्टिफायर के AC सीरो पर ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी के दोनों साइड वाले सीरे लगाया जाता है।
तथा उसके पॉजिटिव और नेगेटिव से पॉजिटिव नेगेटिव सीरे से सप्लाई प्राप्त की जाती है ।
ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी वाले के बीच वाले से जो सप्लाई प्राप्त की गई है वह ग्राउंड कहा जाता है इस प्रकार इस पावर सप्लाई में तीन प्रकार की आउटपुट सप्लाई प्राप्त की गई है।
1-: पॉजिटिव सप्लाई
2-:नेगेटिव सप्लाई
3-:ग्राउंड
Voltage dubler tripalar circuit-:
0 - 6 के ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी वोल्टेज से 3 गुना अधिक वोल्टेज प्राप्त किया जा सकता है अर्थात आउटपुट में 18 वोल्ट प्राप्त हो सकता है इस आउटपुट वोल्टेज में करंट कैपेसिटी बहुत ही कम होती है इसमें अधिक आउटपुट प्राप्त होने का मुख्य कारण दोनों फिल्टर कैपेसिटर की अलग-अलग चार्जिंग कैपेसिटर(1) और डायोड (1) सेकेंडरी के दूसरे सिरे से चार्ज होता है तथा कैपेसिटर(2)डायोड(2)और सेकेंडरी के दूसरे सिरे से चार्ज होता है सेकेंडरी का दूसरा सिरा ऐसा कामन सीरा है जो डायोड(1)के लिए नेगेटिव तथा डायोड(2) के लिए पॉजिटिव आउटपुट देता है ।
9 volt एलिमिनेटर(R-c फिल्ट्रेशन)-:
एक अनरेगुलेटेड पावर सप्लाई जिसे हम सामान्य भाषा में एलिमिनेटर या एडोप्टर के नाम से पहचानते हैं उन मे मुख्यतः तीन भाग बने होते हैं।
1-:Step up or step down part
स्टेप अप या स्टेप डाउन विभाग
2-:Rectification part
रेक्टिफिकेशन विभाग
3-:Filtration part
फिल्ट्रेशन विभाग
1-: Step up or step down parts.
सामान्यतः घरों में दी जाने वाली एसी सप्लाई 230 या 220 वोल्ट की होती है जबकि विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अलग-अलग मान के AC या DC सप्लाई पर चलते हैं किसी भी प्रकार की पावर सप्लाई का स्टेप डाउन या स्टेप अप विभाग 230 वोल्ट या 220 वोल्ट AC को उस से चलाए जाने वाले उपकरण की आवश्यकता के अनुसार एसी सप्लाई को कम या अधिक करता है सामान्यतः यह कार्य ट्रांसफार्मर के प्रयोग से किया जाता है ट्रांसफार्मर के इनपुट सिरे पर 230 या 220 वोल्ट की सप्लाई दी जाती है । जो ट्रान्सफारमर आउटपुट मे इनपुट से अधिक सप्लाई प्रदान करते हैं उसे स्टेप अप ट्रांसफॉर्मर कहते हैं ऑडियो आउटपुट मे इनपुट से कम सप्प्लाई प्रदान करता है उसे स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर कहते हैं।
सामान्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में अधिकतर स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर ही प्रयोग किए जाते हैं स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर निम्न प्रकार के होते हैं।
Singal wanding Transfarmar-:
सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में प्राइमरी में दो और सेकेंडरी में दो सिरे निकले हुए होते हैं। प्राईमरी और सेकेंडरी अलग अलग पहचान करने के लिए प्राइमरी में लाल रंग की तारें तथा सेकेंडरी में काले रंग की या हरे रंग की तार निकली होती है कुछ ट्रांसफार्मर में तार की जगह पर वाइन्ड़िग वायर निकले होते तो उनमें दोनों वाइंडिंग के अवरोध चेक करते हैं जिस वाइंडिंग के अवरोध अधिक होता है वह प्रायमरी वाइंडिंग होता है तथा जिस वाइंडिंग का अवरोध कम हो वह सेकेंडरी वाइंडिंग होता है। इस प्रकार के ट्रांसफॉर्मर को खरीदने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमें कितने वोल्ट का ट्रांसफॉर्मर खरीदना है यदि हमें 6 वोल्ट का ट्रांसफॉर्मर खरीदना है तो दुकानदार से कहेंगे कि हमें 0-6 का ट्रांसफॉर्मर चाहिए।
0-6 का मतलब है की सेकेंडरी के एक सीरे पर 6 वोल्ट तथा दुसरे कामन सीरे पर 0 वोल्ट आयेगा।
बाजार में उपलब्ध कुछ सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफार्मर-:
0 - 3.5, 0 - 4.5 ,0 - 6 , 0 - 7.5 , 0 - 9 0 - 12 , 0 - 18 , 0 - 24 etc.
Singal wanding multi voltage transfarmar-:
सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में मल्टी वोल्टेज प्रकार के ट्रांसफार्मर भी प्रयोग किए जाते हैं इनकी सेकेंडरी में 3 या 3 से अधिक सीरे निकले होते हैं जिनमें एक सिरा कॉमन इस सिरे के सापेक्ष शेष दोनों सिरों में अलग-अलग वोल्टेज प्राप्त होते हैं ।
बाजार में उपलब्ध कुछ सिंगल वाइंडिंग मल्टी वोल्टेज ट्रांसफॉर्मर-:
0-4.5-6 , 0-6-9 , 0-9-12 etc.
1.5 से 12 वोल्ट तक के सिंगल वाइंडिंग मल्टी वोल्टेज ट्रांसफॉर्मर के सेकेंडरी में कुल 8 सीरे होते हैं जिनमें एक सिरा कॉमन होता है शेेष 7 सीरेअलग अलग वोल्टेज के होते हैं इन में से किसी एक सिरे को सिलेक्ट करने के लिए सेकेंडरी वाइंडिंग के साथ 1 पोल 7 वे स्विच का प्रयोग किया जाता है इस ट्रांसफार्मर में जब कोई वंचित वोल्ट सिलेक्ट किए जाते हैैं तो वे वोल्टेज स्विच के पोल और कामन सीरे के बीच होते है।
इस प्रकार से एक बार मे केवल एक ही प्रकार के वोल्ट प्राप्त कर सकते है।
Double wanding transfarmar-:
डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में प्राइमरी साइड में दो सिरे तथा से सेकेंडरी में 3 सीरे होते हैं तीनों सीरो में से बीच का सीरा कॉमन तथा उसके सापेक्ष दोनों सिरे समान वोल्टेज केपेसिटी के होते हैं।
3-0-3 , 4.5-0-4.5 , 6-0-6 , 9-0-9 ? 12-0-12 , 24-0-24 etc.
Double wanding multi voltage transfarmar-:
डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में भी मल्टी वोल्टेज अर्थात एक से अधिक वोल्टेज कैपेसिटी के ट्रांसफार्मर आते हैं किंतु इनमें अधिकतर दो प्रकार की वोल्टेज देने वाले ही होते हैं इसके लिए इसकी सेकेंडरी में कुल 5 तार निकले होते हैं जिनमें बीच का तार कॉमन और इन के सापेक्ष वाले दोनों सिरे समान वोल्टेज कैपेसिटी के होते हैंं तथा बाहरी किनारेेेे वाले सिरे समान वोल्टेज के होते हैं
L- wanding Trnsfarmar-:
कुछ ट्रांसफॉमर्स की सेकेंडरी वाइंडिंग में कुल 5 सिरे होते हैं जिनमें से तीन आपस में कंटिन्यूटी देते हैं तथा शेष दो आपस में कंटिन्यूटी देते हैं स्पष्ट है कि ट्रांसफार्मर में एक वाइंडिंग सिंगल कॉइल वाली है तथा दूसरी वाइंडिंग डबल कॉइल वाली है इस प्रकार के ट्रांसफार्मर में बनी सिंगल वाइंडिंग इन माइनिंग कहते हैं।
Current capacity of transfarmar :
जिस प्रकार ट्रांसफार्मर अलग-अलग वोल्टेज कैपेसिटी के आते हैं उसी प्रकार ट्रांसफार्मर में अलग-अलग करंट कैपेसिटी भी होती है।
जैसे-जैसे हम ट्रांसफार्मर की करंट कैपेसिटी बढ़ाते हैं वैसे वैसे ट्रांसफार्मर की साइज भी बड़ी होती है इसका मुख्य कारण है कि तार की मोटाई बढाई जाने पर करंट कैपेसिटी बढ़ जाती है जिसकी वजह से ट्रांसफार्मर की साइज भी बढ़ जाती है।
बाजार में उपलब्ध अलग-अलग करंट कैपेसिटी के ट्रांसफार्मर-:
200 mA, 350mA,500mA,750mA, 1 Amp,2Amp,3Amp...................10 Amp etc.
Rectification parts of power supply-:
पावर सप्लाई में लगे ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी वाइंडिंग से जो सप्लाई प्राप्त होती है वह एसी सप्लाई होती है इसे डीसी में बदलने के लिए रेक्टिफायर विभाग में दिया जाता है जो ACसप्लाई को DC में बदलता है इसे रेक्टिफिकेशन विभाग कहते हैं। रेक्टिफायर विभाग में लगे पुर्जों रेक्टिफायर या डायोड कहलाते हैं डायोड एक बेसिक पुर्जे के रूप में प्रयोग किया जाता है इसकी विशेषता यह है कि केवल यह एक ही दिशा में सप्लाई को पास करता है रेक्टिफायर सर्किट को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है।
1-:हाफ वेव रेक्टीफिकेशन
हाफ वेव रेक्टिफिएर सर्किट में सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर की सेकेंडरी से एक डायोड लगाया जब ट्रांसफार्मर की प्रायमरी वाइंडिंग को AC सप्लाई मिलती है तो उसकी सेकेंडरी से AC वोल्ट आउट होकर डायोड के नेगेटिव सिरे पर आता है यह डायोड केवल उस समय ही संचरण करता है जब उसके नेगेटिव सिरे पर AC पोजिटिव हाफ साइकिल आता है यह हाफ साइकल इसके लिए फॉरवर्ड बायस का कार्य करता है डायोड केवल फॉरवर्ड बायस मिलने पर ही सप्लाई को पास करता है ऐसी के नेगेटिव हाफ साइकिल के दौरान डायोड से कोई सप्लाई पास नहीं होती क्योंकि यह उसके लिए रिवर्स बॉयस होती है।
यदि इस सर्किट में डायोड को पलट कर लगा दिया जाए तो अब इसकी पॉजिटिव सिरे को AC सप्लाई प्राप्त होगी तथा इसका नेगेटिव हाफ साइकल फारवर्ड बायस की तरह प्राप्त होगा और डायोड की आउटपुट से नेगेटिव हाफ साइकिल प्राप्त होगा। इस प्रकार सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी कॉइल के एक सिरे पर डायोड लगाकर हाफ वेव DC प्राप्त करने की प्रक्रिया को हाफ वेव रेक्टिफिकेशन कहते हैं।
2-:फुल वेव रेक्टिफिकेशन
हाफ रेक्टिफिकेशन से प्राप्त DC अच्छी क्वालिटी की DC नहीं कहा जा सकता अच्छी क्वालिटी की DC के लिए यह जरूरी है कि दोनों हाफ पल्सो के बीच में कोई रिक्त स्थान ना हो अर्थात लगातार हाफ पल्स प्राप्त हो यह क्रिया एक विशेष प्रकार के रेक्टिफायर सर्किट के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जिसे फुल वेव रेक्टिफायर कहते हैं ।
फुल वेव रेक्टिफिकेशन दो प्रकार से किया जाता है
1-:दो डायोड के द्वारा-:
यह रेक्टिफिकेशन डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर सेकेंडरी के दोनों साइड वाले सिरो पर एक एक डायोड समान ध्रुवता में लगाकर बनाया जाता है और दोनों डायोड्स के पॉजिटिव सिरो को आपस में जोड़ा जाता है अब डायोड एक और दो तभी संचरण करेंगेे जब इन दोनों के नेगेटिव सिरे पर AC का पॉजिटिव हाफ साइकिल प्राप्त होगा जब डायोड एक पर AC का पॉजिटिव हाफ साइकल होता है तो डायोड दो पर नेगेटिव हाफ साइकल होता है और जब डायोड एक पर नेगेटिव हाफ साइकल होता है तो डायोड दो पर पॉजिटिव हाफ साइकल होता है इस प्रकार डायोड एक और दो प्रत्यावर्ती क्रम में संचरण कर के Ac के प्रत्येक हाफ साईकिल का उपयोग करते हैं परिणाम स्वरुप आउटपुट में प्राप्त डीसी के दो पल्सो के बीच रिक्तता खत्म हो जाती है।
चार डायोड के द्वारा।(ब्रिज रेक्टिफिकेशन)
एक सिंगल वाइन्डिंग ट्रान्सफार्मर की सेकेंडरी मे एक सीरे पर दो डायोड का एक का पोजिटीव व दुसरे का निगेटिव जोडा जाता है और सेकेंडरी के दुसरे सीरे पर दो डायोड का एक का पोजिटीव व दुसरे का नेगेटिव सिरा जोडा जाता है और पहले सीरे के पहले डायोड के शेष बचे नेगेटिव को दुसरे सीरे के पहले डायोड के शेष बचे निगेटिव सीरे मे जोडते हैऔर पहले सीरे के दुसरे डायोड पोजिटिव को दुसरे सीरे के पहले डायोड के पोजिटिव मे जोडते है।
Filtration system-:
रेक्टिफायर विभाग से प्राप्त होने वाली DC सप्लाई हाफ पल्सेस होने के कारण इसे किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में प्रयोगिक रूप से सही नहीं है क्योंकि बैटरी या सेल से प्राप्त होने वाली DC सप्लाई में किसी भी प्रकार का कोई पल्स नहीं होता बैटरी व शेल्स के लिए स्मूथ DC अच्छा माना जाता है।
पलसेटिंग DC को स्मूथ DC बनाने के लिए फिल्ट्रेशन विभाग का प्रयोग किया जाता है।
आप जानते है की एक केपेसिटर AC को पास करता है या उन्हे रोकता है और एक क्वाइल AC का विरोध करता है ।
अगर हम AC पल्सेटीँग लाइन के पेरेलल मे एक केपेसिटर लगाये तो यह AC पल्सेस को बाइपास कर देगा
इसके अलावा पल्सेटींग डीसी की लाइन मे अगर एक क्वाइल को सीरीज मे लगाते हैं तो यह AC पल्सेस को रोक लेगी।
इसके अलावा कुछ फिल्ट्रेशन सर्किट में रजिस्टेंस का प्रयोग किया जाता है रजिस्टेंस AC व DC पर समान कार्य करता है, इसका प्रमुख कार्य करंट को कंट्रोल करना होता है।
ये पार्ट्स पल्सेटींग DC मे से कुछ हद तक ही AC पल्सेस को अलग कर पाते हैं।
Types of filter circuits-:
फिल्टर सर्किट मुख्य रूप से तीन प्रकार केे होते है-:
1-: केपेसिटर इनपुट फिल्टर सर्किट-:
पावर सप्लाई में ऐसी पल्सेस को बाईपास करने के लिए लोड के पैरेलल में एक इलेक्ट्रोलाइट कैपेसिटर लगाया जाता है। इस कैपेसिटर को कैपेसिटर इनपुट या शंट कैपेसिटर फिल्टर कहते हैं ।
जैसे ही कैपेसिटर के सिरों पर सप्लाई आती है वैसे ही यह उसे अपने अंदर चार्ज कर लेता है कैपेसिटर की चार्जिंग तब तक चलती है जब तक कि रेक्टिफिकेशन में लगा डायोड फॉरवर्ड बायस में रहकर संचरण करता है तथा यह संचरण केवल एसी के हाफ साइकिल पर ही होता है उसके बाद जैसे ही ऐसी का दूसरा हाफ साइकिल आता है तो डायोड रिवर्स बॉयस में आ जाता है तथा कैपेसिटर की चार्जिंग रुक जाती है इस समय लोड को आवश्यक सप्लाई कैपेसिटर में चार्ज सप्लाई से मिलती है इस समय के केपेसिटर डिस्चार्ज होता है उसके बाद जैसे ही ऐसी का साइकिल बदलता है डायोड पुनः चार्ज हो जाता है यह क्रिया लगातार चलती रहती है ।
केपेसिटर कि चार्जिग और डिस्चार्जिँग की वजह से पल्सेटींग DC स्मुथ डीसी बन जाती है।
यहां कैपेसिटर के मान को निर्धारित करने के लिए विशेष सावधानी की जरूरत होती है कैपेसिटर डायोड की रिवर्स स्थिति में लोड को सप्लाई प्रदान करता है अतः इसकी चार्जिंग करंट कैपेसिटी इस स्तर की होनी चाहिए कि यह लोड को पर्याप्त करंट देकर चला सके इसके अलावा हाफ वेव रेक्टिफायर से प्राप्त आउटपुट पल्सेस की संख्या फुल वेव रेक्टिफायर में प्राप्त आउटपुट पल्सेस की संख्या से आधी होती है अतः फुल वेव रेक्टिफिकेशन अपेक्षा हाफ वेव रेक्टिफिकेशन में अधिक मान के फिल्टर की आवश्यकता होती है।
2-: चौक इनपुट फिल्टर सर्किट-:
सीरीज में लगी क्वायल भी एक फिल्टर की तरह कार्य करती है सीरीज में लगी क्वायल AC के लिए एक हाई इंपेडेंस पुर्जे की तरह कार्य करती है और AC को रोकती है लेकिन DC के लिए एक शार्ट सर्किट की तरह कार्य करती है जब किसी क्वाइल में करंट बहती है तो उसकी कोर में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इनर्जी स्टोर होती है और जब यह करंट मिलनी बंद हो जाती है तो यह स्टोर एनर्जी लोड को प्राप्त हो जाती है इस प्रकार आउटपुट में रिपल्स को कम किया जा सकता है ।
एक चौक फिल्टर में लगातार रेक्टिफायर करंट बहती है जबकि एक कैपेसिटर के प्रयोग से बने फिल्टर में केवल साइकल के बहुत कम भाग के लिये करंट बहती है। इसीलिए जहां रेक्टिफायर से लोड के लिए अधिक करंट प्राप्त की जाती है वहां चौक इनपुट फिल्टर अच्छा फिल्ट्रेशन प्रदान करता है।
3-:रजिस्टेंस कैपेसिटर फिल्टर सर्किट-:
जिसे सर्किट के लिए आउटपुट करंट का मान बहुत कम होता है वहां क्वाइल की जगह पर सामान्य रजिस्टर प्रयोग की जाती है कम करंट पर यह सर्किट अच्छा कार्य करता है तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह किफायती रहते हैं।
जैनर डायोड-:
जेनर डायोड एक ऐसा डायोड होता है जो सर्किट में वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए प्रयोग किया जाता है।
यह विभिन्न वोल्टेज और करंट कैपेसिटी के होते हैं ।
एक जेनर डायोड आने वाली अधिक सप्लाई को अपनी वोल्टेज कैपेसिटी के बराबर कर देता है लेकिन आने वाली सप्लाई है उसकी वोल्टेज कैपेसिटी से कम है तो उसे बढ़ा नहीं सकता है।
सर्किट में इसे सप्लाई के पैरेलल में लगाया जाता है।
एक सामान्य डायोड फॉरवार्ड सप्लाई को पास करता है ना कि रिवर्स को इस डायोड की भी एक निश्चित वोल्टेज और करंट कैपेसिटी होती है एक सामान्य डायोड की वोल्टेज कैपेसिटी उसकी रिवर्स सप्लाई को रोकने की कैपेसिटी होती है तथा करंट कैपेसिटी उस डायोड में से बह सकने वाली फारवर्ड करंट की अधिकतम सीमा होती है।
इसका अर्थ यह है -:
माना कि किसी जेनर की केपेसिटी 50 वोल्ट 100mA है तो इस डायोड को यदि 50 वोल्ट तक की रिवर से सप्लाई दी जाए तो यह उसे बिना खराब हुई है रोकेगा लेकिन यदि सप्लाई का मान 50 वोल्ट से अधिक हो जाएगा तो डायोड खराब हो जाएगा इसके अलावा इस डायोड की फारवर्ड करंट कैपेसिटी 100 mA इससे अधिक करंट कैपेसिटी का लोड लगा देने पर यह डायोड खराब हो जाएगा।
Combination of zener diodes-:
दो या दो से अधिक जेनर डायोड्स को एक साथ एक ही सर्किट में प्रयोग करना उनका संयोजन कहलाता है यह दो प्रकार से संयोजित किया जाता है-:
1-: Series combination of zener diodes.
दो या दो से अधिक जेनर डायोड को इस प्रकार जोड़ा जाए कि एक का कैथोड दूसरे का एनोड तथा दूसरे का कैथोड तीसरे का एनोड जुड़ा हो तो यह डायोड का सीरीज संयोजन कहलाता है इस संयोजन में कुल वोल्टेज कैपेसिटी का मान सभी जेनर डायोड की वोल्टेज कैपेसिटी के योग के बराबर होता है।
2-:Pairellal combination of zener diodes.
जब दो या दो से अधिक जेनर डायोड को इस प्रकार जोड़ा जाए कि उन सभी के कैथोड को आपस में जोड़कर कॉमन कैथोड बनाया जाए और सभी के एनोड को जोड़कर कॉमन एनोड बनाया जाए यह संयोजन जेनर डायोड का पैरेलल संयोजन कहलाता है।
इस संयोजन में लगे सभी जेनर डायोड समान वोल्टेज कैपेसिटी के होने चाहिए।
इस संयोजन में कुल वोल्टेज कैपेसिटी का मान संयोजन में लगे एक जेनर डायोड की वोल्टेज केपेसिटी के बराबर होता है लेकिन जेनर डायोड की करंट कैपेसिटी अधिक हो जाती है।
How to use a bridge rectifier in duble wanding transfarmar-:
साधारण रूप से ब्रिज रेक्टिफिकेशन के लिए सिंगल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर का प्रयोग किया जाता है लेकिन किन्ही विशेष परिस्थितियों में यदि डबल वाइंडिंग ट्रांसफॉर्मर में ब्रिज रेक्टिफिकेशन प्रयोग करना हो तो इस विधि का प्रयोग करें-:
चार डायोड लगाकर ब्रिज रेक्टिफिकेशन बनाया जाता है।
ब्रिज रेक्टिफायर के AC सीरो पर ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी के दोनों साइड वाले सीरे लगाया जाता है।
तथा उसके पॉजिटिव और नेगेटिव से पॉजिटिव नेगेटिव सीरे से सप्लाई प्राप्त की जाती है ।
ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी वाले के बीच वाले से जो सप्लाई प्राप्त की गई है वह ग्राउंड कहा जाता है इस प्रकार इस पावर सप्लाई में तीन प्रकार की आउटपुट सप्लाई प्राप्त की गई है।
1-: पॉजिटिव सप्लाई
2-:नेगेटिव सप्लाई
3-:ग्राउंड
Voltage dubler tripalar circuit-:
0 - 6 के ट्रांसफार्मर की सेकेंडरी वोल्टेज से 3 गुना अधिक वोल्टेज प्राप्त किया जा सकता है अर्थात आउटपुट में 18 वोल्ट प्राप्त हो सकता है इस आउटपुट वोल्टेज में करंट कैपेसिटी बहुत ही कम होती है इसमें अधिक आउटपुट प्राप्त होने का मुख्य कारण दोनों फिल्टर कैपेसिटर की अलग-अलग चार्जिंग कैपेसिटर(1) और डायोड (1) सेकेंडरी के दूसरे सिरे से चार्ज होता है तथा कैपेसिटर(2)डायोड(2)और सेकेंडरी के दूसरे सिरे से चार्ज होता है सेकेंडरी का दूसरा सिरा ऐसा कामन सीरा है जो डायोड(1)के लिए नेगेटिव तथा डायोड(2) के लिए पॉजिटिव आउटपुट देता है ।
9 volt एलिमिनेटर(R-c फिल्ट्रेशन)-:
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| 1.5 to 12 volt eliminetor.jptechnologyraz.jpg |
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| 6&9 volt eliminetor.jptechnologyraz.jpg |





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ReplyDeleteI obtained some useful points with this blog site. Packers And Movers In Chennai
ReplyDeleteTHANXXX
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